प्रत्येक मरीज हमारा पारिवारिक सदस्य, हम क्यूं चाहेंगे उसका अहित - डॉ. अंकित मेश्राम

इंदौर : हाल ही में उत्पन्न आर के हॉस्पिटल के विवाद की विवेचना से कुछ तथ्य सामने आए जो दूध का दूध, पानी का पानी करने में सक्षम सिद्ध होंगे! सर्वप्रथम आर के हॉस्पिटल के प्रत्येक सदस्यों को मरीज की मृत्यु पर गहरी संवेदना है, यह ऐसा प्रोफेशन है, जिसमें सेवा के साथ पुण्य कमाया जाता है! जब पेशेंट स्वस्थ हो कर अपने घर जाता है तो ढेरों आशीर्वाद के साथ मन प्रसन्न कर खुशी खुशी यंहा हॉस्पिटल से विदा होता है, आप मानेगें हमें पेशेंट, उनके परिवार से ज़्यादा खुशी होती है, हमें आगे प्रोत्साहन के साथ स्वयं पर गहरा विश्वास होता जाता है, आगे कार्य करने की चेष्टा जाग्रत हो बहुत सी प्रेरणा मिलती है! किंतु इसके विपरीत जब हम पर निष्क्रियता के आरोप लगाए जातें, हमारे समर्पण पर अविश्वास जताया जाता है तो मन खिन्न हो अंदर से टूट जाता है! डॉक्टर को भगवान का दूसरा रूप कहा जाता है, पर आप के हिसाब से कुछ गलत होने पर वह एकदम शैतान क्यों नज़र आता है! आगे डॉक्टर अंकित मेश्राम बताते है की में एमडी मेडिसिन हूँ, छाया जायसवाल जोंकी 24 वर्ष आयु की हो मेरे अंडर में ही आर के हॉस्पिटल में भर्ती हुई, जो टीबी जैसी घातक रोग से ग्रसित थी, टीबी रोग ने उनके शरीर को गहरा इन्फेकटेड कर दिया था, उपचार में देरी के चलते यह स्थिति बनी की उन्हें बचाया न सका!
उनके परिवार द्वारा हॉस्पिटल पर बहुत से इल्जामात लगाए गए जिसे आर के हॉस्पिटल के सभी स्टॉफ के साथ में ख़ुद भी अस्वीकार करता हूँ! सबसे पहले मृतक छाया को बड़ी ख़राब स्थिति में बीते शनिवार को हॉस्पिटल लाया गया, जिसे हमनें आईसीयू रख बेहद प्रभावशाली इलाज़ कर पुनः सुरक्षित स्टेज़ तक लाया गया, किंतु होनहार को कोई टाल नहीं सकता, भर्ती के चार दिन बाद अच्छे से बोलते चालते, खाते पीते एक दम स्वास्थ्य का ख़राब होना, हमारे भरचक प्रयासों के बाद भी छाया को न बचा पाना, एक भ्रमाणिय क्रियाकलाप मात्र है!
परिजन द्वारा आरोप है की नाश्ता करने के तुरंत बाद घबराहट हुई, ऑक्सीजन सिलेंडर वहां नही होने से छाया नहीं बच सकी! 
जबकी मंगलवार सुबह व स्टॉफ के बदलने से पूर्व व बाद में रूटीन तौर पर बीपी, मेडिसिन व संपूर्ण मरीजों की विवेचना के बाद ही एक दूसरे को रिलीव किया जाता है, जिसमें छाया का सेचुरेशन 95% व सभी स्थिति सामान्य पायी गई थी अर्थात ऑक्सीजन लगाने निकालने की कोई भी आवश्यकता नहीं थी! इसपर से भी छाया की स्थिति बिगड़ते ही मात्र चालीस सेकण्ड में उन्हें वार्ड से आई सी यू में पहुँचा गया, जँहा तत्काल सीपीआर के साथ दवाईयों को दिया गया! हमारे पास आस्मिक दवाइयां आई सी यू में तुरंत उपलब्ध होती है, जिसके चलते ही छाया के परिवार जनों से दवाईया मंगवाई गई, यह दायित्व सीनियर स्टॉफ का होता है जिसे उन्होंने अपनाया, जबकी दूसरी ओर डॉक्टर ने छाया को मृत घोषित कर दिया था जिसके चलते घरवालों को लगा की मृत्यु के बाद भी इलाज़ चालू है, जबकी ऐसा कुछ नहीं था! जबकी आप परिवारजनों से पूछेंगे तो पाएंगे मात्र कुछ शुल्क जमा कर चार दिनों तक इलाज़ किया जिसका बिल भी हजारों में है! जबकी छायाँ के परिवार ने स्टॉफ को मारकुट कर उन्हें गंभीर रूप से घायल कर दिया, तोड़फोड़ कर हॉस्पिटल को हजारों का नुकसान पंहुचाया! कहते है हॉस्पिटल में लाइट्स चली गई थी, जबकी ऑटोजनरेटर मात्र कुछ ही सेकण्ड में चालू हो विधुत प्रदाय कर देता है!
हमनें हमारे उप्पर लगाए सभी लांछनो का एक सिरे से जवाब मुख्य चिकित्सक अधिकारी स्टॉफ (CHMO) के साथ पुलिसप्रशासन को दे दिया है, सम्भवतः सत्य की विजय हो स्वतः ही दूध का दूध पानी का पानी हो जाएगा!

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